School Education : स्कूल शिक्षा के “शैक्षणिक कैलेण्डर” में कहां फिट होगा “युक्तियुक्तकरण “…?

School Education :बिलासपुर (मनीष जायसवाल) । पूर्व सरकार के कार्यकाल के दौरान स्कूल शिक्षा विभाग शिक्षकों के ट्रांसफर पोस्टिंग और पदोन्नति संशोधन मामले की वजह से सुर्खियों में था।अब इस सरकार में भी विभाग स्कूलों और शिक्षकों के युक्तियुक्तकरण की वजह से चर्चा में आ गया है..! इस मामले में सरकार बैक फुट की स्थिति में नही है लेकिन दिखाई जरूर दे रही है..। वही शिक्षक संघ और शिक्षक नेता युक्तियुक्तकरण की प्रकिया के रोकने के लिए अधिकारी के अधिकारियो को दिए मुंह जबानी खर्च पर पर खुश हो रहे है…! मिठाई बांट रहे है जीत खुशी मनाते हुए बधाई शुभकामनाएं लेने देने की होड़ मचाए हुए..। इन कई तरह की चर्चाओं में स्कूलों में बजने वाली घंटी की आवाज दब जा रही है।
School Education/एकल शिक्षकीय और शिक्षक विहीन स्कूलों के छात्रों और शिक्षकों की समस्याओं पर सबका का ध्यान बंटता हुआ दिखाई दे रहा है …! शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए युक्तियुक्तकरण की योजना का इंजन अपनी चाल बदलता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन इन सब में दबा हुआ मुद्दा स्कूल शिक्षा का शैक्षणिक कैलेंडर , विभाग के चल रहे प्रयोगों और गैर शिक्षकीय कार्यो का मसला मेन स्ट्रीम लाइन में समाने आ गया है।
School Education /शैक्षणिक कैलेंडर और नीति के लिहाज से देखा जाए तो प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था ब्रिटेन के संविधान जैसी लचीली है। कोई भी चीज संहिताबद्ध और क्रम बद्ध नहीं है और अधिकांश अलिखित है। शिक्षक हमेशा इस बात की दुहाई देते रहते हैं कि शैक्षणिक कैलेंडर एक दिखावा है..! स्कूलों के ग्रीष्म कालीन और शीतकालीन अवकाश पहले से तय रहते है..।ठीक ऐसे ही राज्य की स्कूली शिक्षा का कैलेंडर पहले से ही तय रहता है..।इसमें क्या पढ़ना है..।कितने दिनों तक पढ़ना है..। कब तिमाही परीक्षा लेनी और कब छमाही और कब वार्षिक परीक्षा होगी सब कुछ तय होता है..।इसमें केवल तारीख है बस इसमें आगे पीछे होते रहती है। लेकिन यह पूरा सिस्टम हर साल बिगड़ जाता है। क्योंकि इस तय शैक्षणिक कैलेंडर में बीच-बीच में नई-नई योजनाएं एड आन होते रहती है।
School Education/इसमें कई बार इसमें कुछ केंद्र सरकार से मिले कुछ निर्देश या प्रोग्राम होते हैं। तो कही सालाना शैक्षणिक कैलेंडर के बीच में स्कूल शिक्षा विभाग में सुधार के लिए किए जाने वाले प्रयोग से जुड़ी कई योजनाएं आ जाती है। फिर बीच में राष्ट्रीय महत्व से जुड़े निर्वाचन के कार्य भी आ जाते हैं। तो कभी राज्य से जुड़ी हुई कई योजनाओं में शिक्षकों की सहभागिता से जुड़े कार्यक्रम भी आ जाते हैं। रही सही कसर शिक्षकों के हक की लड़ाई की उनकी मांगों की बात आ जाती है जिसमे शिक्षक हड़ताल में भी चले जाते हैं।
अब नया शिक्षकों की पदोन्नति ट्रांसफर और अब युक्तियुक्तकरण का मौसम आ गया है। जिसका भी कोई टाइम टेबल स्कूल शिक्षा विभाग ने शैक्षणिक कैलेंडर को ध्यान में रखते हुए तय नहीं किया है।अब ऐसे में पढ़ाई कैसे हो पाएगी। वह भी तब जब 2008 का स्कूल शिक्षा विभाग का सेटअप तो स्कूलों में पूरी तरह लागू ही नहीं है। ऐसी व्यवस्था में शिक्षा गुणवत्ता कहां से आएगी। नुकसान में तो छात्र ही है।
School Education/आंकड़ों के नजरिए से देखा जाए तो शैक्षणिक कैलेंडर में स्कूल लगने के दिन करीब 220 से 230 के बीच मानें जाते है। करीब इतने दिनों की स्कूलों की पढ़ाई के बाद छात्र अगली कक्षा में जाने को तैयार हो जाते हैं। कुल मिलाकर छात्रों को स्कूलों में पढ़ने और सीखने के लिए इतने दिन मिलते हैं…। इसमें भी कई बार छात्र छुट्टी पर रहते हैं। शिक्षक भी अपने अधिकारों के तहत मिलने वाली छुट्टी लेते रहते हैं और महिला कर्मचारियों को मिलने वाले विशेष अधिकारों के तहत छुट्टियां अलग होती है।
शिक्षको की स्कूलों की परीक्षा चुनाव कार्य अन्य गैर शिक्षक की कार्य में शिक्षकों की ड्यूटी लगते रहती है। तो वहीं ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में धान की फसल लगने और काटने के समय स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति कम ही रहती है। ऐसे में 220 से 230 दिन के शाला लगने के दिनों में पढ़ाई कितने दिनों होती होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
स्कूल का मास्टर शासन की नीतियों की वजह से शिक्षक कम स्कूल का बाबू अधिक बनता जा रहा है..। कभी सरकारी स्कूल में शिक्षक प्रार्थना के बाद कक्षा में हाजिरी के साथ पढ़ाई शुरू करा देता था। अब प्राथमिक और मिडिल स्कूल का शिक्षक छात्रों की हाजरी के बाद आन लाइन मध्यान्ह भोजन की जानकारी अपलोड करता है। साल में कई दिन तो आन लाइन छात्रवृत्ति, इंपायर अवार्ड उच्च कार्यालय संकुल में जानकारी भेजना डेली डायरी भरने के फेर में फंसा रहता है। ऐसे में युक्तियुक्तकरण के पैमाने के नजरिए से प्राथमिक स्कूल की पांच कक्षा में 60 छात्रों में दो शिक्षक जिसमें प्रधान पाठक को भी शिक्षक के रूप में गिना जाना कितना व्यावहारिक हो सकता है।
School Education/शिक्षको के शक्ति परीक्षण देखे बिना अनुमान के आधार कर नगरीय निकाय चुनाव के पूर्व सरकार को बैक फुट पर आता देख पार्टी के शुभचिंतक हैरान है।युक्तियुक्तकरण की प्रक्रिया फिलहाल रुकी हुई नजर आ तो रही है। जिसके आदेश अभी आए नही आए है । जिसमे सुधार की गुंजाइश नजर आ रही है। यदि वार्षिक कैलेंडर जारी कर शिक्षकों के उच्च पदों पर पदोन्नति और निम्न हुए रिक्त हुए पदों पर नई भर्ती के मॉडल पर ठोस नीति बना कर आम शिक्षक के साथ शिक्षक संघ को भरोसे में लेकर उनके शंका समाधान के साथ जितनी कक्षा उतने शिक्षक रखने की कोशिश के साथ यदि युक्तियुक्तकरण किया जाता है। परिणाम बेहतर हो सकते हैं।









